Monday, November 15, 2010

ईको फ्रैंडली फर्नीचर भा जाए, छा जाए
सुबोध भारतीय
First Published:15-11-10 05:15 PM
Last Updated:15-11-10 05:15 PM
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देखा जाए तो ज्यादातर घरेलू फर्नीचर के निर्माण में लकड़ी का ही प्रयोग किया जाता है, जो सीधे-सीधे पर्यावरण को क्षति पहुंचाता है। इसके निर्माण में मशीनों का प्रयोग और इसकी पॉलिश आदि में जिन-जिन रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, वे और भी पर्यावरण विरोधी हैं। इसलिए अब जागरूक व्यक्ति ईको फ्रैंडली फर्नीचर का चयन करके पर्यावरण-रक्षा में सहयोग दे रहे हैं।

क्या है ईको फ्रैंडली फर्नीचर
ऐसा फर्नीचर - जिसके निर्माण के लिए पेड़ों को न काटा जाए, ऐसे कैमिकल इस्तेमाल न किए जाएं, जो टॉक्सिक हैं और ऐसे पदार्थो का प्रयोग किया जाए, जो री-साइकल किए जा सकते हों- ईको फ्रैंडली फर्नीचर कहलाता है।

औद्योगिक और घरेलू वेस्ट को री-साइकल करके ईको फ्रैंडली फर्नीचर बनाया जाता है। केन, बांस और सरकंडे का उपयोग करके सुन्दर फर्नीचर बनाया जा रहा है, जो कहीं भी पर्यावरण को क्षति नहीं पहुंचाता। इनका उत्पादन प्रकृति बहुत बड़ी मात्र में और तेजी से करती है। असम, नागालैंड और उत्तराखंड में केन, बांस और सरकंडों की फसल भारी मात्र में होती है और यह वहां के लाखों लोगों की जीविका का साधन भी है। इस्पात, ग्लास, स्टोन और प्लास्टिक वो मैटीरियल हैं, जो आसानी से री-साइकल किए जा सकते हैं।

कैसे करें इनका चयन
अब बाजार में ईको-फ्रैंडली फर्नीचर आसानी से उपलब्ध है। फर्नीचर में वुड का जो भी विकल्प है, वह पर्यावरण रक्षक है-मसलन एमडीएफ (मीडियम डेंसिटी फाइबर बोर्ड) देखने में एकदम लकड़ी जैसा लगता है, बल्कि उसकी फिनिश लकड़ी से भी अच्छी होती है। कम्प्यूटर टेबल से लेकर सम्पूर्ण किचन तक एमडीएफ से बनाई जा रही हैं। यह विविध रंगों और आकार में उपलब्ध है। इसमें पॉलिश की भी जरूरत नहीं पड़ती। बाजार में इसकी बेशुमार वैरायटी उपलब्ध है।

इसी प्रकार बेंत, बांस और सरकंडे से बना फर्नीचर भारतीय संस्कृति में हमेशा रचा-बसा रहा है और इसका निर्माण भी गांव-देहातों में ही किया जाता था। मगर पिछले एक-दो दशकों से शहरों में इस प्रकार का फर्नीचर आसानी से मिलने लगा है। केन फर्नीचरकी वैरायटी ड्राइंग रूम के सोफा सेट, सेंटर टेबल से लेकर बैडरूम फर्नीचर तक उपलब्ध है। इस फर्नीचर की पॉलिश में ऐसे किसी भी कैमिकल या पेंट का इस्तेमाल प्राय: नहीं किया जाता, जो पर्यावरण को दूषित करे। बल्कि केन और बैम्बू फर्नीचर की पॉलिश-पेंट आप स्वयं भी कर सकते हैं। यह फर्नीचर परंपरागत व मॉडर्न दोनों प्रकार के डिजाइनों में उपलब्ध है। फर्नीचर के अतिरिक्त इनसे मैचिंग लैम्प शेड्स, झूमर, वॉल हैंगिंग आदि एक्सेसरीज भी आसानी से मिल जाती हैं।

रॉट आयरन का फर्नीचर भी ईको फ्रैंडली है, क्योंकि यह री-साइकल किया जा सकता है। केन और रॉट आयरन का कॉम्बिनेशन फर्नीचर को एक नई खूबसूरती तो देता ही है, टिकाऊ और मजबूत भी बना देता है। इसमें स्टोन का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

बाजार में अब रॉट आयरन, बेंत, बांस और स्टोन से बना विदेशी फर्नीचर भी आ गया है, जिसकी खूबसूरती और फिनिश लाजवाब है। दाम भी ज्यादा नहीं, अफोर्डेबल हैं। चीन, मलेशिया और इंडोनेशिया ऐसे देश हैं, जिनका ईको फर्नीचर जग प्रसिद्ध है।

ईको-फर्नीचर के साथ जूट फैब्रिक या जूट मैट्स का कॉम्बिनेशन आपके ड्राइंग रूम के ईको-फ्रैंडली लुक में चार चांद लगा देगा। इसी प्रकार सोफे की सीट की बुनाई में जूट की रस्सी का इस्तेमाल किया जा सकता है।

कहां मिलते हैं ये फर्नीचर
-क्राफ्ट म्यूजियम, प्रगति मैदान, भैरों मार्ग, नई दिल्ली
-हैंडीक्राफ्ट एम्पोरियम, जनपथ, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली
-सभी राज्यों के एम्पोरियम, बाबा खड़क सिंह मार्ग, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली
-पुल मिठाई, आजाद मार्केट, दिल्ली (केन फर्नीचर की होलसेल मार्केट है)
-कीर्ति नगर (विदेशी ईको-फ्रैंडली फर्नीचर के लिए)

लाभ
-ईको फ्रैंडली फर्नीचर लकड़ी के फर्नीचर की तुलना में सस्ते हैं।
-इनके निर्माण की प्रक्रिया सरल है और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाती।
-ये वजन में हल्के होते हैं और आसानी से इन्हें पुनव्र्यवस्थित किया जा सकता है।
-इनकी मेंटेनेन्स आसान है और हर साल पॉलिश करवाने की जरूरत नहीं होती।
-परंपरागत और मॉडर्न दोनों प्रकार के डिजायनों में इनकी वैरायटी उपलब्ध है-होम इंटीरियर के लिए भी और आउटडोर गार्डन तथा लॉबी के लिए भी।
-सस्ते होने की वजह से इस फर्नीचर को बदलना जेब और दिल को तकलीफ नहीं देता।
-चार पांच साल में इसे बदल कर आप अपने घर को एक नया लुक दे सकते हैं।

साज-संभाल
-ईको फ्रैंडली फर्नीचर की यदि हर रोज झाड़-पोंछ की जाए तो यह सदा नया जैसा दिखेगा।
-ये वजन में हल्का होता है और इसलिए इसे समय-समय पर री-अरेंज करके ड्राइंग रूम की लुक बदल सकते हैं।
-टैराकोटा के गमलों में इंडोर प्लांट के साथ इस फर्नीचर का संयोजन घर के ईको फ्रैंन्डली लुक में चार चांद लगा देगा।
-केन और बांस के फर्नीचर को आप अपनी पसंद अनुसार डिजाइन भी करवा सकते हैं। इसके लिए होल सेल मार्केट जाएं।
-इन्हें टिकाऊ और मजबूत बनाने के लिए केन के साथ रॉट आयरन और स्टोन का भी इस्तेमाल करें।

(यह लेख हिंदुस्तान दैनिक के १६ नवम्बर के अंक में प्रकाशित हुआ है)

ईको फ्रैंडली फर्नीचर भा जाए, छा जाए
सुबोध भारतीय
First Published:15-11-10 05:15 PM
Last Updated:15-11-10 05:15 PM
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देखा जाए तो ज्यादातर घरेलू फर्नीचर के निर्माण में लकड़ी का ही प्रयोग किया जाता है, जो सीधे-सीधे पर्यावरण को क्षति पहुंचाता है। इसके निर्माण में मशीनों का प्रयोग और इसकी पॉलिश आदि में जिन-जिन रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, वे और भी पर्यावरण विरोधी हैं। इसलिए अब जागरूक व्यक्ति ईको फ्रैंडली फर्नीचर का चयन करके पर्यावरण-रक्षा में सहयोग दे रहे हैं।

क्या है ईको फ्रैंडली फर्नीचर
ऐसा फर्नीचर - जिसके निर्माण के लिए पेड़ों को न काटा जाए, ऐसे कैमिकल इस्तेमाल न किए जाएं, जो टॉक्सिक हैं और ऐसे पदार्थो का प्रयोग किया जाए, जो री-साइकल किए जा सकते हों- ईको फ्रैंडली फर्नीचर कहलाता है।

औद्योगिक और घरेलू वेस्ट को री-साइकल करके ईको फ्रैंडली फर्नीचर बनाया जाता है। केन, बांस और सरकंडे का उपयोग करके सुन्दर फर्नीचर बनाया जा रहा है, जो कहीं भी पर्यावरण को क्षति नहीं पहुंचाता। इनका उत्पादन प्रकृति बहुत बड़ी मात्र में और तेजी से करती है। असम, नागालैंड और उत्तराखंड में केन, बांस और सरकंडों की फसल भारी मात्र में होती है और यह वहां के लाखों लोगों की जीविका का साधन भी है। इस्पात, ग्लास, स्टोन और प्लास्टिक वो मैटीरियल हैं, जो आसानी से री-साइकल किए जा सकते हैं।

कैसे करें इनका चयन
अब बाजार में ईको-फ्रैंडली फर्नीचर आसानी से उपलब्ध है। फर्नीचर में वुड का जो भी विकल्प है, वह पर्यावरण रक्षक है-मसलन एमडीएफ (मीडियम डेंसिटी फाइबर बोर्ड) देखने में एकदम लकड़ी जैसा लगता है, बल्कि उसकी फिनिश लकड़ी से भी अच्छी होती है। कम्प्यूटर टेबल से लेकर सम्पूर्ण किचन तक एमडीएफ से बनाई जा रही हैं। यह विविध रंगों और आकार में उपलब्ध है। इसमें पॉलिश की भी जरूरत नहीं पड़ती। बाजार में इसकी बेशुमार वैरायटी उपलब्ध है।

इसी प्रकार बेंत, बांस और सरकंडे से बना फर्नीचर भारतीय संस्कृति में हमेशा रचा-बसा रहा है और इसका निर्माण भी गांव-देहातों में ही किया जाता था। मगर पिछले एक-दो दशकों से शहरों में इस प्रकार का फर्नीचर आसानी से मिलने लगा है। केन फर्नीचरकी वैरायटी ड्राइंग रूम के सोफा सेट, सेंटर टेबल से लेकर बैडरूम फर्नीचर तक उपलब्ध है। इस फर्नीचर की पॉलिश में ऐसे किसी भी कैमिकल या पेंट का इस्तेमाल प्राय: नहीं किया जाता, जो पर्यावरण को दूषित करे। बल्कि केन और बैम्बू फर्नीचर की पॉलिश-पेंट आप स्वयं भी कर सकते हैं। यह फर्नीचर परंपरागत व मॉडर्न दोनों प्रकार के डिजाइनों में उपलब्ध है। फर्नीचर के अतिरिक्त इनसे मैचिंग लैम्प शेड्स, झूमर, वॉल हैंगिंग आदि एक्सेसरीज भी आसानी से मिल जाती हैं।

रॉट आयरन का फर्नीचर भी ईको फ्रैंडली है, क्योंकि यह री-साइकल किया जा सकता है। केन और रॉट आयरन का कॉम्बिनेशन फर्नीचर को एक नई खूबसूरती तो देता ही है, टिकाऊ और मजबूत भी बना देता है। इसमें स्टोन का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

बाजार में अब रॉट आयरन, बेंत, बांस और स्टोन से बना विदेशी फर्नीचर भी आ गया है, जिसकी खूबसूरती और फिनिश लाजवाब है। दाम भी ज्यादा नहीं, अफोर्डेबल हैं। चीन, मलेशिया और इंडोनेशिया ऐसे देश हैं, जिनका ईको फर्नीचर जग प्रसिद्ध है।

ईको-फर्नीचर के साथ जूट फैब्रिक या जूट मैट्स का कॉम्बिनेशन आपके ड्राइंग रूम के ईको-फ्रैंडली लुक में चार चांद लगा देगा। इसी प्रकार सोफे की सीट की बुनाई में जूट की रस्सी का इस्तेमाल किया जा सकता है।

कहां मिलते हैं ये फर्नीचर
-क्राफ्ट म्यूजियम, प्रगति मैदान, भैरों मार्ग, नई दिल्ली
-हैंडीक्राफ्ट एम्पोरियम, जनपथ, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली
-सभी राज्यों के एम्पोरियम, बाबा खड़क सिंह मार्ग, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली
-पुल मिठाई, आजाद मार्केट, दिल्ली (केन फर्नीचर की होलसेल मार्केट है)
-कीर्ति नगर (विदेशी ईको-फ्रैंडली फर्नीचर के लिए)

लाभ
-ईको फ्रैंडली फर्नीचर लकड़ी के फर्नीचर की तुलना में सस्ते हैं।
-इनके निर्माण की प्रक्रिया सरल है और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाती।
-ये वजन में हल्के होते हैं और आसानी से इन्हें पुनव्र्यवस्थित किया जा सकता है।
-इनकी मेंटेनेन्स आसान है और हर साल पॉलिश करवाने की जरूरत नहीं होती।
-परंपरागत और मॉडर्न दोनों प्रकार के डिजायनों में इनकी वैरायटी उपलब्ध है-होम इंटीरियर के लिए भी और आउटडोर गार्डन तथा लॉबी के लिए भी।
-सस्ते होने की वजह से इस फर्नीचर को बदलना जेब और दिल को तकलीफ नहीं देता।
-चार पांच साल में इसे बदल कर आप अपने घर को एक नया लुक दे सकते हैं।

साज-संभाल
-ईको फ्रैंडली फर्नीचर की यदि हर रोज झाड़-पोंछ की जाए तो यह सदा नया जैसा दिखेगा।
-ये वजन में हल्का होता है और इसलिए इसे समय-समय पर री-अरेंज करके ड्राइंग रूम की लुक बदल सकते हैं।
-टैराकोटा के गमलों में इंडोर प्लांट के साथ इस फर्नीचर का संयोजन घर के ईको फ्रैंन्डली लुक में चार चांद लगा देगा।
-केन और बांस के फर्नीचर को आप अपनी पसंद अनुसार डिजाइन भी करवा सकते हैं। इसके लिए होल सेल मार्केट जाएं।
-इन्हें टिकाऊ और मजबूत बनाने के लिए केन के साथ रॉट आयरन और स्टोन का भी इस्तेमाल करें।

(यह लेख हिंदुस्तान दैनिक के १६ नवम्बर के अंक में प्रकाशित हुआ है)

Wednesday, November 10, 2010

कौन हैं बच्चों के रोल मॉडल्स
सुबोध भारतीय
First Published:10-11-10 05:08 PM
Last Updated:10-11-10 05:40 PM
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11वीं के स्टूडेंट अर्जुन बग्गा अपना रोल मॉडल आमिर खान को मानते हैं। ‘मिस्टर परफेक्शनिस्ट’ आमिर बच्चों में बहुत अच्छी तरह कनेक्ट कर पाते हैं। लगान, तारे जमीन पर और थ्री ईडियट्स में बच्चों को प्रेरित करने के लिए बहुत कुछ था, जो कि दिलचस्प तो था ही, बहुत आसान तरीके से समझाया भी गया था। अजरुन का कहना है-आमिर भले ही कम फिल्में करते हों, मगर उनकी फिल्में मीनिंगफुल और मनोरंजक होती हैं। फिल्म के हीरो आमिर खान को अपनी जिंदगी का हीरो मानने में कोई हर्ज नहीं गर्व होता है।

भारतरत्न डॉ. अब्दुल कलाम भी बहुत-से बच्चों के रोल मॉडल हैं। एक मछुआरे के बेटे कलाम की जिंदगी एक छोटे-से गांव से शुरू हुई थी। अपनी लगन, योग्यता और मेहनत के बल पर वह देश के शीर्षस्थ वैज्ञानिक बने। राष्ट्रपति बनने के बाद बच्चों से ज्यादा जुड़े और सभी बच्चों में लोकप्रिय हो गए। अपने कार्यकाल में तीन लाख स्कूली बच्चों से मिलकर उन्होंने भारत के भविष्य को एक नई संभावना और सोच दी। कलाम अंकल की बच्चों-जैसी मासूम हंसी और सादगी हर बच्चों को अच्छी लगती है।

सचिन तेंदुलकर ऐसे खिलाड़ी हैं, जो देश के ही नहीं, विदेश के भी लाखों बच्चों के रोल मॉडल बने हुए हैं। सचिन की स्कूली पढ़ाई भी पूरी नहीं हो पाई थी कि उन्हें बड़े बच्चों के बीच झोंक दिया गया। सचिन ने यह इम्तिहान तो पास किया, मगर अपने बचपन को खोकर।

11वीं कक्षा के छात्र कौशल को सचिन अपने रोल मॉडल इसलिए लगते हैं, क्योंकि उन्होंने सफलता के शिखर को छूकर भी अपनी शालीनता और गरिमा को बखूबी बनाए रखा है। कभी विवादों में नहीं पड़े। कौशल को बड़ा गर्व होता है जब विम्बलडन के मैदान में सचिन की उपस्थिति की घोषणा होते ही उनके सम्मान में सारे दर्शक खड़े होकर तालियां बजाते हैं। यही सम्मान सचिन ने अपने खेल और गरिमामय व्यवहार से सारी दुनिया की विपक्षी टीमों से भी हासिल किया है।

ऑस्कर जीतकर भारत की शान बढ़ाने वाले संगीतकार एआर रहमान के पिता का निधन उस समय हो गया था जब वह सिर्फ 16 वर्ष के थे। अपने घर को चलाने का बोझ रहमान के नाजुक कंधों पर आ गया। मगर रहमान ने यह बोझ बखूबी उठाया ही नहीं, अपितु अपनी बेजोड़ प्रतिभा से संगीत की दुनिया की परिभाषा ही बदल डाली। यही वजह है कि रहमान आज हजारों-लाखों बच्चों के रोल मॉडल बन चुके हैं। सचिन की ही तरह वह शर्मीले और सिम्पल हैं।

कृतिका गुप्ता को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने रोल मॉडल लगते हैं, जो एक राजनेता न होकर भी एक काबिल और कुशल प्रधानमंत्री हैं। प्रधानमंत्री की योग्यता और सादगी अपने आप में एक मिसाल है। मनमोहन सिंह संभवत: विश्व के एक मात्र प्रधानमंत्री हैं, जो अर्थशास्त्री भी हैं। और यह हमारा सौभाग्य है कि देश की अर्थव्यवस्था और विकास इनके सुरक्षित हाथों में है।

9वीं कक्षा की छात्र प्रिया बत्रा को ब्यूटी और सक्सेस का अद्भुत कॉम्बिनेशन दिखता है-ऐश्वर्या राय बच्चन में। मिस वर्ल्ड बनने के बाद जिस तरह ऐश्वर्या ने खुद को फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित किया, वह एक मिसाल है। फिर अपनी अभिनय क्षमता और सुंदरता के बल पर अंतरराष्ट्रीय स्टार बनीं और कई विदेशी फिल्मों में हीरोइन बन देश का नाम ऊंचा किया।

कनिष्क हरभजनका को अमिताभ बच्चन अपने रोल मॉडल लगते हैं। कनिष्क के अनुसार, 68 वर्षीय अमिताभ में युवाओं से भी ज्यादा जोश बरकरार है। उनकी अभिनय क्षमता और गरिमामय उपस्थिति सभी को इम्प्रेस करती है। शायद यही वजह है कि यह बुजुर्ग अभिनेता यंग जनरेशन का रोल मॉडल हैं।

कम्युनिकेशन और टैक्नोलॉजी के इस युग में दुनिया तेजी से सिमटकर करीब आती जा रही है। कोई आश्चर्य ही बात नहीं कि आज बच्चों के रोल मॉडल स्वदेशी ही नहीं विदेशी आइकॉन्स भी बन गए हैं। दुनिया के सबसे धनी व्यक्तियों में शुमार किए जाने वाले बिल गेट्स और वॉरेन बफेट की अकूत संपत्ति से ज्यादा उनका उस संपत्ति के अधिकांश हिस्से को दान और समाज कल्याण के लिए बांटना, इम्प्रेस करता है।

दोस्तों, हमारे जो रोल मॉडल्स हैं, उनकी कहानी विपरीत परिस्थितियों से जूझकर ऊपर उठने की है। चाहे ए।आर. रहमान हों, अब्दुल कलाम या मनमोहन सिंह। इनका बचपन कठिन परिस्थितियों में बीता। ये मुंह में चांदी की चम्मच लेकर पैदा नहीं हुए थे। सच्चे हीरो वही होता है, जो जूझकर, फाइट करके विनर बनता है और दुनिया पर छा जाता है।

( यह लेख दैनिक हिंदुस्तान के ११ नवम्बर के अंक में प्रकाशित हुआ है)

Tuesday, November 2, 2010

घर के मेकओवर को दें फाइनल टच
लाइट्स, डेकोरेशन..एक्शन
सुबोध भारतीय
First Published:01-11-10 12:17 PM
Last Updated:01-11-10 12:19 PM
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रोशनी और खुशियों का त्योहार दीपावली अब आपके दरवाजे तक आ पहुंचा है। बाजार सज गए हैं और लोग खर्च करने के मूड में आ गए हैं। हर तरफ खुशी और उमंग का माहौल है..और क्यों न हो, आखिर दीपावली हमारे देश का सबसे बड़ा त्योहार है। कल धनतेरस के साथ ही दीपावली का पांच दिनों का उत्सव शुरू हो जाएगा।

ऐसे बदलें घर के फर्श और दीवारों का लुक

यदि आप अपने घर को पेंट कराने से चूक गए हैं तो कोई बात नहीं, इसे आप दिवाली के बाद के लिए टाल दीजिए। घर की अच्छी तरह सफाई कीजिए। इस काम को आप वैक्यूम क्लीनर की मदद लेकर जल्दी ही निबटा सकेंगे। घर को फेस्टिवल लुक देने के लिए पैसों से ज्यादा आपको अक्ल का इस्तेमाल करना होगा। आपके पास जो छोटे या मध्यम आकार के फ्लोर रग्स हैं, उन्हें मुख्य दीवारों पर टांग कर आप एक चमत्कारी इफेक्ट पैदा कर सकते हैं। अगर यह रग्स डार्क कलर के हैं तो और भी बेहतर होगा। ऐसा करने से आपके फ्लोर और वॉल्स दोनों का लुक ही बदल जाएगा।

रंगोली दिवाली की सजावट का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। दीवार पर सजावट का एक और ऑप्शन रंगोली सजाने का है। इसमें आजकल बाजार में मिलने वाली रंगोलियां भी इस्तेमाल की जा सकती हैं, जिन्हें दीवार पर चिपका कर नया लुक दिया जा सकता है। घर का मुख्य दरवाजा वंदनवार से जरूर सजाएं, मगर सुरुचिपूर्ण तरीके से, ताकि उससे आपका टेस्ट पता चले। मुख्य द्वार पर रंगोली बनाएं-फर्श का एक छोटा हिस्सा इस्तेमाल करें और गीले चॉक से रंगोली का आकार बनाएं। इसके बाद गुलाल के विभिन्न रंगों और चावलों से उसे सजाएं। चावलों को विभिन्न रंगों में रंग कर भी रंगोली बना सकते हैं।

अच्छा लुक देते हैं ये इनडोर प्लांट्स

घर के प्लांट्स अगर पूरे साल उपेक्षित पड़े रहे हैं तो अब वक्त आ गया है उनसे घर सजाने का। इनडोर प्लांट्स के एक-एक पत्ते को हल्के गीले कपड़े से साफ करें। उनके गमले यदि पुराने और टूट-फूट गए हैं तो बदल डालें। उन्हें खूबसूरत तरीके से पेंट करके एक पर्सनल टच दें। दिवाली के दिनों में ड्राइंग रूम में सजे-संवरे प्लांट्स बाहर के पॉल्यूशन से भी बचे रहेंगे और घर को भी एक अच्छा लुक देंगे।

ड्राइंग रूम में एक खूबसूरत चौड़ा पॉट पानी भर कर उसमें फूलों की खुशबूदार पत्तियां डाल दें। फिर रात्रि के समय उसमें फ्लोटिंग कैंडल्स (तैरने वाले दीये) जला दें। बेहतरीन समां दिखाई देगा।

खूबसूरत व कलात्मक दीये

धनतेरस से ही दीये जलने शुरू हो जाते हैं, जो भाईदूज तक जलाये जाते हैं। मुख्य द्वार और घर के कुछ मुख्य स्थानों पर प्रतिदिन जलने वाले दीये मिट्टी के बने हों और उन पर कुछ पेंट या ड्राइंग कर सजाना एक बेहतर विकल्प है। इन्हें और बढ़िया लुक देने के लिए छोटे-छोटे शीशे या टूटी चूड़ियों को भी चिपका कर अपनी कलात्मक अभिरुचि का परिचय दे
सकते हैं।

फर्नीचर को करें री-अरेंज

घर के फर्नीचर को नया लुक देने के लिए उनको कुछ अलग तरीके से री-अरेंज करना एक बेहतर आइडिया है। इससे आपके ड्राइंग रूम की लुक में एक नयापन आ जाएगा। सोफे के यदि आप कवर नहीं बदल पाए हैं तो कुशन कवर बदलना भी काफी होगा। अगर लिविंग एरिया और डाइनिंग एरिया का आपस में स्थान परिवर्तन हो जाए तो भी एक नया लुक आ जाएगा।

कंडील की जगमगाहट

कंडील का दिवाली की सजावट में एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। मुख्य द्वार पर एक छोटी-सी कंडील या लालटेन की जगमगाहट लाजवाब होती है। अंदर ड्राइंग रूम में अच्छे आकार की कंडील सजाने से घर जगमगा उठेगा।

फूलों से सजावट

दीपावली के दिनों में फूलों की सजावट इनडोर में करें। हर रोज नये फ्लावर चुनें। गुलाब, लिली, जैस्मीन के साथ घर में रंगों को बिखेर दें। फूलों के खुशनुमा एहसास का विकल्प कोई भी अन्य चीज नहीं कर सकती।

बनाएं लड़ियों और दीयों का कॉम्बिनेशन

दिवाली रोशनी का त्योहार है और घर के बाहर की शोभा रोशनी से ही होती है। मिट्टी के दीये हर घर में परंपरागत रूप से जलाये जाते हैं। कुछ लोग मोमबत्तियों का भी इस्तेमाल करते हैं। बिजली के बल्बों की लड़ी और दीयों का कॉम्बिनेशन बनाया जा सकता है। इसका इफैक्ट काफी अच्छा होगा।

दिवाली पर गिफ्ट

मिठाइयां दिवाली की सदाबहार गिफ्ट आइटम्स हैं, मगर इन्हें दिवाली पर कई रोज पहले ही बना लिया जाता है, इसलिए दूध या छैने की मिठाइयां खरीदने से बचें। देशी घी से बनी मिठाइयां खरीदें।

मिठाई, नमकीन और बिस्कुट्स के कॉम्बी पैक आजकल काफी लोकप्रिय होने जा रहे हैं। इनके आकार बड़े हैं और दाम छोटे। रसगुल्ला, सोन पापड़ी, गुलाब जामुन, भुजिया, बिस्कुट व पेठे आदि के कॉम्बी बाजार में भरे पड़े हैं।

ड्राई फ्रूट पैक्स दिवाली गिफ्ट के रूप में दिन-ब-दिन लोकप्रिय होते जा रहे हैं। इस बार कई कम्पनियों ने विदेशी काजू, बादाम व पिस्ता के आकर्षक पैक्स बाजार में उतारे हैं। क्वालिटी बेहतरीन है, मगर थोड़ी महंगी है।

बिस्कुट-चॉकलेट का चलन भी बढ़ता जा रहा है, मगर विदेशी पैक्स की एक्सपायरी डेट्स संदेहास्पद रहती हैं। अपने लोकल बेकर से कुकीज बास्केट खरीदना एक अच्छा चयन होगा। हर अच्छे बेकर ने कुकीज और फ्रेश चॉकलेट व केक्स की शानदार वैरायटी निकाली हैं।

परफ्यूम्ड कैंडल्स की बेशुमार वैरायटी मार्केट में आ गई है। दिवाली पर यह अच्छे उपहार के रूप में लोकप्रिय होती जा रही है। कैंडल होल्डर्स भी गिफ्ट किए जाते हैं।

होम लिनेन यानी बैड शीट, कुशन और पिलो कवर्स की स्पेशल वैरायटी दिवाली के दिनों में लॉन्च हुई है और वह भी आकर्षक दामों में। सभी फर्निशिंग स्टोर्स पर इनकी वैरायटी उपलब्ध है।

क्रॉकरी या होम अप्लायंसेज की बहुत अच्छी वैरायटी हर बड़े स्टोर में गिफ्ट पैक के रूप में मौजूद है। इम्पोर्टेड क्रॉकरी खरीदने के लिए गफ्फार मार्केट, करोल बाग से बढ़िया कोई ठिकाना नहीं है।

चांदी-सोने के आयटम्स में सिक्कों के अलावा अब 500-1000 के चांदी के नोट भी ज्वैलर्स के पास उपलब्ध हैं। चांदी-सोने की धार्मिक मूर्तियां और तस्वीरें भी गिफ्ट करने का अच्छा ऑप्शन है।

सूट लेंथ, शर्ट-पैन्ट सेट व रिस्ट वॉच ऐसे उपहार हैं, जो अपने सहयोगियों या वर्कर्स को दिवाली के शुभ मौके पर दिए जा सकते हैं। गारमेंट्स स्टोर्स में इनकी अच्छी वैरायटी उपलब्ध है।

इन सबके अतिरिक्त मेकअप किट्स, ब्यूटी प्रोडक्ट्स और परफ्यूम्स व डिओज के गिफ्ट हैम्पर भी दिवाली पर दिए जाने वाले उपहारों में लोकप्रिय हैं।

घर का लुक बदलने के लिए आसान टिप्स

घर के पायदान बदल कर नए लगाएं।
सोफों के कुशन कवर बदलें।
फर्नीचर को पुनर्व्यवस्थित करें।
मिट्टी के बड़े दीये अपने आप पेंट करके सजाएं।
घर के इनडोर प्लांट्स के गमले पेंट करें।
परदों का कॉम्बिनेशन बदल दें। उन पर कागज के मोटिफ भी लगा सकते हैं।

दिवाली में सजावट के लिए जरूरी

कंडील
फूल
दीये
वंदनवार
रंगोली
लाइटिंग
मोटिफ्स
फ्लोटिंग कैंडल्स

(यह लेख हिंदुस्तान के २ नवम्बर के अंक में प्रकाशित हुआ है.)

Thursday, October 21, 2010

छोड़ो मस्ती दिखाओ चुस्ती
सुबोध भारतीय
First Published:20-10-10 02:05 PM
Last Updated:20-10-10 02:05 PM
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भरपूर मस्ती, स्कूल से छुट्टी और हर ओर बस खेल की चर्चा। कितना अच्छा वक्त था ना! न सुबह-सुबह वक्त पर स्कूल पहुंचने की टेंशन और न ही स्कूल के बाद टय़ूशन जाने की भागमभाग। पर, अब बहुत हो गई मौज-मस्ती। स्कूल खुल गए हैं और फिर से लौट आया है वही पुराना टाइम-टेबल। अब टाइम-टेबल को फॉलो करना है, स्कूल से लेकर खेल के मैदान तक अव्वल आना है, तो हेल्दी रहना भी तो जरूरी है ना! हेल्दी रहना भी किसी चुनौती से कम नहीं है। किसी को डेंगू हो रहा है, तो किसी को चिकनगुनिया। साथ में बदलते मौसम की मार। तुम हेल्दी रहो, यह सिर्फ पेरेंट्स की ही जिम्मेदारी नहीं है। कैसे मौज-मस्ती के साथ चुस्त और हेल्दी भी रहा जा सकता है, बता रहे हैं सुबोध भारतीय

कॉमनवेल्थ गेम्स खत्म हो गए और साथ ही खत्म हो गईं दशहरे की लंबी छुट्टियां। इस बार छुट्टियों में बच्चों को धमाल मचाने का शानदार मौका मिला। जिन्हें स्पोर्ट्स में रुचि थी, वे खेल देखने जा सकते थे और जिनके पेरेंट्स इन लंबी छुट्टियों में घर से निकलना चाहते थे, उन्हें मिला सैर-सपाटे के लिए दूर-दराज के इलाकों में जाने का मौका। बच्चों के तो मानो दोनों हाथों में लड्डू थे। पढ़ाई से तो मानो नाता ही टूट गया था और हर तरफ बस धमा-चौकड़ी, मौज-मस्ती और खाना-पीना था। मगर जैसे हर अच्छी चीज का अंत होता है, इन छुट्टियों का भी अंत हुआ और बच्चों की वही दुनिया शुरू हो गई, सुबह 6 बजे से।

पर, अब आपको एक चीज का ख्याल रखना होगा-बदलते मौसम का। दिन छोटे होने लगे हैं और रातें बड़ी। दिन में गरमी लगती है और रात को पंखा भी धीमा करना पड़ता है। मच्छरों की तो न जाने कितनी किस्में पैदा हो गई हैं। हर रोज डेंगू, चिकनगुनिया और वायरल फीवर के केस सुनने को मिल रहे हैं और सबसे चिंता की बात यह है कि बच्चे भी इन रोगों के शिकार हो रहे हैं। अगर थोड़ी-सी सावधानी बरती जाए तो इन रोगों से और मच्छरों से बचा जा सकता है।

टी-शर्ट और निक्कर पहनना किस बच्चे को अच्छा नहीं लगता? मगर मच्छरों को भी यह अच्छा लगता है और वह आसानी से उन बच्चों को अपना शिकार बनाते हैं, जो ऐसे कपड़े पहनते हैं। डेंगू, चिकनगुनिया आदि रोग मच्छरों के काटने से ही होते हैं। खेलकर आने के बाद पसीने से भीगे हुए बच्चे अभी भी फ्रिज का ठंडा पानी पीकर अपना गला खराब कर लेते हैं। गला खराब होता है और फिर फीवर की बारी आती है और उसके बाद हो जाती है स्कूल से अनचाही छुट्टी। इतनी लंबी छुट्टियों के बाद दोबारा छुट्टी करने का मतलब-क्लास में पीछे रह जाना और पढ़ाई का नुकसान।

प्रसिद्ध होम्योपैथी डॉक्टर अनीता यादव का कहना है- ‘इन दिनों दिन और रात के तापमान में काफी अंतर आ चुका है। खांसी, जुकाम और एलर्जी की शिकायतें बच्चों में कॉमन हो गई हैं। इसका कारण है हमारे शरीर में इन दिनों विटामिन-सी की कमी हो जाती है। इसलिए इन दिनों में बच्चों को नींबू-पानी, मौसमी, संतरा आदि निरंतर लेना चाहिए, जो विटामिन-सी के सबसे अच्छे स्नोत हैं। विटामिन सी से आपकी त्वचा भी हेल्दी रहेगी।

हेल्दी लाइफ के लिए हेल्दी खाना

मौसम चाहे कोई भी हो, हेल्दी रहने और बीमारियों से दूर रहने के लिए अच्छा और पौष्टिक खाने से बेहतर कोई और उपाय नहीं है। कभी-कभार पित्जा-बर्गर खाना ठीक है, पर इम्यून सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए ऐसी डाइट लें जो आपके इम्यून सिस्टम को मजबूत बना सके। तभी तो तुम हेल्दी रहोगे और हर फील्ड में आओगे अव्वल।

आजकल के बच्चे स्मार्ट भी हैं और अपनी हेल्थ का ख्याल भी रखना जानते हैं। इन टिप्स को अपनाने से आप हेल्दी रह सकते हैं।

बदलते मौसम को देखते हुए फ्रिज का ठंडा पानी पीना एकदम छोड़ दें और घर के एसी को अगली गर्मियों तक की छुट्टी दे दें।

मच्छर इन दिनों आतंकवादी बन गए हैं और इस मौसम में सबसे ज्यादा एक्टिव रहते हैं। इनसे बचने के लिए कोशिश करें कि पूरी बाजू की शर्ट और पैंट पहनें। यदि ऐसा करना संभव न हो तो मच्छरों से बचाने वाली क्रीम को खुले अंगों पर लगा लें।

शाम 5 से 6 बजे के बीच मच्छर घरों में घुस जाते हैं। इस दौरान घर का कोई भी दरवाजा-खिड़की खुला ना रखें।

कम-से-कम एक महीने के लिए आउटडोर गेम्स को छोड़ दें, मच्छरों से बचाव रहेगा। बदलते मौसम के असर से भी बचेंगे।

इस मौसम में भूख बढ़ जाती है, मगर इसका मतलब यह नहीं कि जंक फूड जैसे पित्जा, बर्गर या समोसा ही खाया जाए। हेल्दी और पोषक तत्त्वों से भरपूर खाना खाएं।

अब आखिर में एक मजेदार बात-आजकल सुबह का मौसम सबसे खुशगवार है। जो बच्चे मॉर्निग वॉक या एक्सरसाइज शुरू करना चाहते हैं, उनके लिए इससे बढ़िया मौसम कोई नहीं हो सकता। सुबह या शाम किसी भी समय एक्सरसाइज और वॉक करने का सुहाना मौसम है ये।

(यह लेख दैनिक हिंदुस्तान में २१ अक्टूबर को प्रकाशित हुआ है)

Tuesday, October 12, 2010

आपका टेस्ट और स्टाइल दर्शाती फ्लोरिंग टाइल्स
सुबोध भारतीय
First Published:12-10-10 12:13 PM
Last Updated:12-10-10 12:15 PM
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टाइल्स की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण इनका किफायती और सुविधाजनक होना है। फ्लोर टाइल्स का चलन इसलिए बढ़ता जा रहा है, क्योंकि पत्थर (स्टोन) के मुकाबले इन्हें बिछाना आसान होता है। पॉलिश करवाने का कोई झंझट नहीं और डिजाइन व रंगों की इतनी अधिक च्वाइस उपलब्ध है, जो कि स्टोन में नहीं है।

इस बारे में ला सरोजिका के इंटीरियर डिजाइनर सौरभ वार्ष्णेय बताते हैं, ‘टाइल्स के बिना हम किसी भी घर, होटल या रेस्टोंरेंट को सजाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। बाजार में उपलब्ध वैरायटी की रेंज इतनी अधिक है कि ग्राहक खुद निर्णय नहीं कर पाता कि किसे चुने और अंतत: सारा काम हमारी कल्पनाशीलता पर ही छोड़ दिया जाता है। टाइल्स के संबंध में अच्छी बात ये भी है कि फर्श का लुक बदलने के लिए बेकार की तोड़फोड़ की कोई जरूरत नहीं पड़ती। कैमिकल से थोड़े समय में टाइल्स बिछाना और लगाना एक अच्छा और आसान विकल्प है।’

टाइल्स का बाजार अब भारतीय टाइल्स निर्माताओं पर ही निर्भर नहीं रह गया है। चाइनीज टाइल्स धीरे-धीरे भारतीय बाजारों में अपनी पैठ बनाती जा रही हैं। सस्ती होने के कारण सीमित बजट वाले ग्राहक इन्हें पसंद करते हैं। हालांकि इस सच्चाई को भी झुठलाया जा नहीं सकता कि बहुत सी भारतीय कंपनियां चीन से टाइल्स आयात कर उस पर अपना ठप्पा लगा कर बेच रही हैं। स्टाइल और हर चीज में अपना डिफरेंट टेस्ट रखने वाले ग्राहकों को इटैलियन और स्पेनिश टाइल्स पसंद आती हैं। इनके रंग और डिजाइन अनूठे हैं, लेकिन यह चुनिंदा शो रूम्स पर ही उपलब्ध हैं। सेरेमिक और वैट्रीफाइड टाइल्स अब साटिन, लैदर और वुड फिनिश में उपलब्ध हैं। ग्लास और स्टील लुक टाइल्स भी इंटीरियर में ग्लैमर पैदा कर देती हैं।

न्यू ट्रेंड्स

टाइल्स में आजकल मैट फिनिश का चलन जोरों पर है। चमचमाती या ग्लॉसी टाइल्स अब ट्रेंड्स से आउट हो गई हैं। ग्लॉसी लुक अब चीप मानी जाती है। बाथरूम में फ्लोरिंग के लिए एंटी स्किड यानी फिसलन रोधी टाइल्स ही लगाना उचित है। इसकी सफाई भी आसान रहती है। बाथरूम में शावर के नीचे हाई लाइट के विरोधी कलर की टाइल्स लगाने से बाथरूम की खूबसूरती बढ़ जाती है। इनमें मोटिफ्स भी इस्तेमाल किए जाते हैं। किचन में कुकिंग एरिया के ऊपर 474 इंच की टाइल्स का रिवाज अब खत्म हो गया है। इसकी बजाय अब 2 फुट और 1 फुट की बड़ी टाइल्स लगने लगी हैं। इनमें भी नया ट्रेंड स्टील लुक वाली टाइल्स का है, जो रसोई की सफाई के लिए सहायक सिद्ध होती हैं। इनमें खाद्य पदार्थों या टी-सेट अदि के मोटिफ्स लगा कर खूबसूरती बढ़ाई जा सकती है। बैडरूम या लिविंग एरिया के फ्लोर पर बड़ी और कम से कम 272 की ज्वाइंट लैस टाइल्स लगाने का रिवाज आ गया है। इनमें ऐसी टाइल्स भी आ गई हैं, जो स्टोन लुक देती हैं।

आजकल फार्म हाउस या कोठी को कॉटेज लुक देने के लिए इनकी छत पर टैराकोटा से बनी कोरोगेटेड (नालीदार) टाइल्स बिछाई जाती हैं, जो देखने में बेहद खूबसूरत, सस्ती और आसानी से लगाई जा सकती हैं। लॉन या गार्डन एरिया में हैक्सामन या विविध आकार की स्टोन टाइल्स भी बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं, जो इस्तेमाल में रफ-टफ होती हैं और गार्डन एरिया की खूबसूरती बहुत बढ़ा देती हैं। बैडरूम जैसे एरिया में हमेशा फ्लोरिंग के लिए हल्के और पेस्टल शेड्स इस्तेमाल करें। इससे मानसिक सुकून महसूस होता है। किचन छोटा हो तो दीवारों पर हल्के रंगी की टाइल्स लगाना ही उचित रहेगा। बड़े किचन में सॉफ्ट रंग इस्तेमाल कर सकते हैं। बड़े या छोटे फ्लोर एरिया में गहरे या चटख रंगों की टाइल्स इस्तेमाल कर सकते हैं, इसका ज्यादा इस्तेमाल से फर्श जल्दी ही उबा देगा। कुछ चुनिंदा कम्पनियां अब कस्टम मेड यानी आपकी पसंद अनुसार टाइल्स भी बनाने लगी हैं, जिन्हें कम्प्यूटर की मदद से बनाया जाता है। इनमें आप अपने पसंदीदा मोटिफ्स या परिवार के फोटो भी प्रिंट करवा सकते हैं। ग्रे, हरा बेज (हल्का) और सेल्फ डिजाइन वाली टाइल्स भी आजकल चलन में है।

प्रमुख टाइल्स बाजार

राजा गार्डन
कोटला मुबारकपुर
मंगोल पुरी
जगत पुरी (कड़कड़डूमा)
ग्रेटर कैलाश
करोल बाग (रैगरपुरा)
मंगोल पुरी
ओखला
नोएडा
पीतमपुरा (शिवा मार्केट)

महत्त्वपूर्ण टिप्स

फ्लोरिंग में कभी भी छोटे टाइल्स इस्तेमाल न करें। इनके ज्वाइंट्स दिखने में भद्दे लगते हैं।

टाइल्स ज्यादा डिजाइन वाली न हों, अन्यथा आप जल्द ही उनसे ऊब जाएंगे।

शोख और चटख रंगों का कम से कम उपयोग करें। यह आंखों को चुभने लगते हैं।

हमेशा प्लेन सरफेस वाली टाइल्स चुनें, ताकि उन्हें आसानी से साफ किया जा सके। एंटीक लुक वाली टाइल्स में खड्डे होते हैं, जिनमें गंदगी और धूल जम जाती है।

टाइल्स बिछाने का काम किसी निपुण कारीगर से करवाएं। महंगी टाइल्स पर लगा पैसा बर्बाद हो सकता है।

बची हुई टाइल्स संभाल कर रखें। भविष्य में कोई भी टाइल खराब होने पर उसे बदलने में आसानी होगी। कई बार टाइल्स के डिजाइन भी बाजार से आउट हो जाते हैं।

घर के जिस हिस्से में ज्यादा आवागमन हो, वहां गहरे रंग इस्तेमाल न करें, वर्ना वह थोड़े दिनों में बदरंग नजर आने लगेगा।

छोटी स्पेस में भी बड़ी और ज्वाइंट लेस टाइल्स लगाने से वह एरिया खुला और बड़ा दिखाई देता है।

हैवी ट्रैफिक एरिया में मजबूत और रफ-टफ टाइल्स लगाएं, क्योंकि उस पर जूते पहने लोग चलेंगे। इसके विपरीत बाथरूम में सॉफ्ट फील वाली टाइल्स नंगे पैरों को अच्छा एहसास देंगी।

टाइल्स की किस्में टाइल्स के आकार टाइल्स का उपयोग
सेरेमिक 8x8 इंच बाथरूम
स्लेट 12x12 इंच लॉबी फ्लोर
ग्लास 8x12 इंच ड्राइंग रूम
मोजेक 12x18 इंच फ्लोर
फाइबर 24x24 इंच मेन डोर वॉल
ग्रेनाइट 48x48 इंच कोटेज रूफ
वेट्रीफाइड 13x27 इंच गज़िबो रूफ

(यह लेख १२ अक्टूबर के दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुआ है.)

Friday, October 8, 2010

संगीत में रंग जमाती सुरीली जोड़ियां
सुबोध भारतीय
First Published:07-10-10 01:51 PM
Last Updated:07-10-10 01:52 PM
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हिंदी फिल्मों से संगीत का अटूट नाता है। सवाक फिल्मों के 60-70 वर्षीय इतिहास में शायद 20 फिल्में भी ऐसी नहीं बनी होंगी, जिनमें गीत-संगीत न हो। इसी प्रकार हिंदी फिल्मों के हर दौर में संगीतकारों की जोड़ियां अपना परचम फहराती रही हैं।
सबसे पहली संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम की थी, जिन्हें लता मंगेशकर को ब्रेक देने का श्रेय प्राप्त है। इन्होंने अपने समय में काफी लोकप्रियता हासिल की। उन दिनों यह जोड़ी अकेले ही चला करती थी और इनके मुकाबले में नौशाद, सी. रामचन्द्र, अनिल विश्वास, चित्रगुप्त, सरदार मलिक जैसे धुरंधर संगीतकार थे।

फिल्माकाश में राज कपूर के आर.के. बैनर के उदय के साथ ही संगीतकार जोड़ियां चल निकलीं। बरसात, आवारा, आग में शंकर जयकिशन के संगीत ने मानो संगीत प्रेमी दिलों पर जादू कर दिया। एक के बाद एक हिट संगीत ने उनकी लोकप्रियता को आसमान तक पहुंचा दिया। खय्याम, एस.डी. बर्मन, रौशन, मदन मोहन, ओ.पी. नैयर जैसे दिग्गजों के होते हुए भी इनकी तूती बोलती रही। अपने समय में शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने अपने शानदार संगीत से तीन सालों तक लगातार (1971-1973) फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते तथा कुल नौ बार। सत्तर के दशक के अंत में जयकिशन की मौत के बाद शंकर ने दस नंबरी और संन्यासी जैसी सुपरहिट फिल्में देकर मानो अपनी पारी समाप्ति की घोषणा कर दी। राजकपूर जैसे मित्र ने भी अब तक उनसे नाता तोड़ लिया था और उनके बैनर तले बनने वाली धर्म करम में आर.डी. बर्मन और बॉबी में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत था।

फिल्मी दुनिया की आगामी हिट संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी की थी, जो साठ के दशक में हेमंत कुमार के असिस्टेंट हुआ करते थे। इनकी जोड़ी ने भी एक के बाद एक छलिया, सरस्वतीचंद्र, उपकार, जंजीर, हेराफेरी, सुहाग, लावारिस, मुकद्दर का सिकंदर, डॉन, अपराध, कुरबानी जैसी हिट फिल्में देकर धूम मचा दी। मगर कल्याणजी के निधन के बाद यह जोड़ी फिल्मों से आउट हो गई। कल्याणजी के पुत्र वीजू शाह ने त्रिदेव, मोहरा आदि फिल्मों के जरिए अपने पिता का जादू चलाने की कोशिश की, मगर अंतत: गुमनामी के अंधेरे में खो गए।

1962 में आई राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म दोस्ती ने कल्याणजी-आनंदजी के सहायक लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को ब्रेक दिया। पारसमणि, आया सावन झूम के, शोर, दाग, रोटी कपड़ा और मकान, नसीब, अमर अकबर एंथनी, रोटी, प्रेम रोग, इक दूजे के लिए, कजर्, सौदागर, राम-लखन, खलनायक, तेजाब, कर्मा, हीरो, सरगम, सत्यम् शिवम् सुंदरम्, क्रांति और हम जैसी सुपरहिट फिल्मों से इस जोड़ी ने जल्द ही अपने गुरुओं को टक्कर देनी शुरू कर दी। मनोज कुमार, राजकपूर, जे. ओमप्रकाश और सुभाष घई जैसे दिग्गजों का प्रश्रय पाकर इन्होंने फिल्मी संगीत को अनेक हिट गीत दिये। अपने शानदार संगीत से चार सालों तक लगातार (1978-1981) फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते। 1999 में लक्ष्मीकांत के निधन के बाद संगीतकारों की यह सबसे कामयाब जोड़ी भी लुप्त हो गई।

इसके बाद के आधुनिक फिल्म संगीत में आनंद-मिलिंद, नदीम-श्रवण और जतिन-ललित का उदय हुआ। जहां आनंद-मिलिंद कयामत से कयामत तक, अंजाम, दिल, बेटा, दूल्हे राजा, कुली नं. 1, अनाड़ी के बाद सफलता कभी दोहरा ना सके, वहीं नदीम-श्रवण आशिकी के साथ फिल्म संगीत के आकाश पर धूमकेतू की तरह छा गए। साजन, दिल है कि मानता नहीं, फूल और कांटे, दीवाना, जुनून, सर, हम हैं राही प्यार के, राजा हिंदुस्तानी जैसी एक के बाद एक हिट फिल्म देकर और लगातार तीन फिल्म फेयर पुरस्कार जीत कर इन्होंने मानो शंकर-जयकिशन की याद ताजा करा दी। गुलशन कुमार की हत्या के आरोपी नदीम के भारत छोड़ कर लंदन भाग कर शरण लेते ही यह जोड़ी अपना जादू खो बैठी। हालांकि उस समय यह जोड़ी टॉप पर थी। एक बार फिर कई वर्ष बाद धड़कन में अपना हिट संगीत देने में कामयाब रहे, मगर वो ट्यूनिंग फिर से न बन पाई और यह जोड़ी बिखर गई। श्रवण के पुत्रों संजीव-दर्शन ने मन में सुमधुर संगीत दिया था, मगर फिल्म फ्लॉप होने से इनके करियर को ब्रेक लग गया।

सुलक्षणा पंडित के भाई जतिन-ललित इतने प्रतिभावान थे कि उनका संगीत कभी आर.डी. बर्मन तो कभी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत की याद दिलाता था। मधुर संगीत से रची इनकी धुनों ने इन्हें ऊंचा दर्जा दिलाया था-जो जीता वही सिकंदर, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, कभी हां कभी ना, राजू बन गया जेंटलमैन, चलते-चलते, हम तुम, मौहब्बतें, कभी खुशी कभी गम, फना, कुछ कुछ होता है जैसी म्यूजिकल फिल्मों के रचयिता लंबी रेस के घोड़े थे, मगर अहं के टकराव के चलते पिछले वर्ष यह जोड़ी टूट गई। अब यह अलग-अलग काम कर रहे हैं, मगर एक भी हिट फिल्म नहीं दे पाए हैं।

शिव कुमार शर्मा और हरि प्रसाद चौरसिया जैसे दिग्गज शास्त्रीय वादकों की जोड़ी को यश चोपड़ा ने सिलसिला में शिव-हरि के रूप में प्रस्तुत किया। इसके बाद चांदनी, डर, लम्हे, परंपरा, विजय आदि में भी। यश चोपड़ा कैम्प से आउट होने के बाद इस जोड़ी को किसी ने नहीं पूछा। अब यह फिल्मों से दूर है।

फिल्म संगीत के आकाश में अभी एक अच्छी टीम शंकर-एहसान-लॉय की है, जो लगातार सुमधुर संगीत देते जा रहे हैं। कल हो ना हो, रॉक ऑन, डॉन, दोस्ताना, मिशन कश्मीर, दिल चाहता है, बंटी और बबली, तारे जमीन पर आदि फिल्में इनके दमदार संगीत का शानदार प्रमाण हैं। इसी प्रकार सलीम-सुलेमान ने आचा नच ले, रब ने बना दी जोड़ी, चक दे इंडिया और विशाल-शेखर की जोड़ी ने दस, झंकार बीट्स, ओम शांति ओम के हिट संगीत दिए।

इन्होंने काफी संभावनाएं जगाई हैं। नये संघर्षरत संगीतकारों में साजिद-वाजिद को सलमान ने काफी प्रमोट किया। प्यार किया तो डरना क्या, हैलो ब्रदर, वांटेड, पार्टनर, मैं और मिसेज खन्ना जैसी फिल्मों से यह उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं।

संगीतकार जोड़ियां
हुस्नलाल-भगतराम
शंकर-जयकिशन
कल्याणजी-आनंदजी
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल शिव-हरी
सपन-जगमोहन

सोनिक-ओमी
आनंद-मिलिंद
दिलिप सेन-समीर सेन
अमर-उत्पल
उत्तम-जगदीश
नदीम-श्रवण
जतिन-ललित
शंकर-एहसान-लॉय
विशाल-शेखर
साजिद-वाजिद
सलीम-सुलेमान
संजीव-दर्शन
निखिल-विनय
बापी-ततुल
जीतू-तपन

(यह लेख ८ अक्टूबर को दैनिक हिंदुस्तान मैं प्रकाशित हुआ है)