रेल की पटरियों से
समाधान खोजती
अपने वज़ूद की चिन्दियाँ
उड़ाने पर आमादा
अपने कुल-मर्यादा की चौखट
कैसे लाँघ गई बेटी?
पुरखों की पगड़ियाँ
तुम्हारे रास्ते भर बिछी रहीं
उनकी सलवटों में
तुम्हारे पाँव जब-तब
ज़रूर लदफदाए होंगे
'ना बेटी, ऎसे न रौंदो'
का आग्रह उनका अनसुना करती
तुम तो बस अपने नर्म पाँवों को
सख़्त बनाती बेतहाशा
चलती गईं, चलती गईं बदहवास
लम्हा भर भी तुम नहीं रुकी
तुम्हें तो ज़िद थी किसी की नही सुनने की
वापसी की कोई भी सिफ़ारिश
कबूल नहीं थी तुम्हें
ज़रा तो सोचतीं
पुरखों की पगड़ियाँ पताके बन जाती हैं
जब कोई बेटी
अपने शील, धैर्य और सहनशीलता से
उन्हें अपने सर पर तान लेती है
पगडंडियाँ तो कई मुक़ामों को जाती हैं
उनकी हदों में
तुमने ज़िन्दगी के आख़िरी पड़ाव
को किन आँखों से लक्ष्य किया?
यह तुम्हारी अपरिपक्व प्रज्ञा का निर्णय था
या कि तुम्हारे त्वरित उद्रेक क झोंका था
या महज़ तुम्हारी तुनकमिज़ाज़ी थी
नाराज़गी तो क़तई नहीं थी
नाराज़गी ऎसे हादसे तय नहीं करती
कच्ची उम्र के बचकाने तजुर्बे
के हवाले हो गईं तुम
और भूल गईं तुम
माँ के दुलार की लहलहाती हरी-हरी कोंपलें
बाप की सूनी आँखों में आँसू के क़तरे
भाई-बहनों, सखी-सहेलियों का
मृगशावक-सा कुँलाचे भरता अनुराग
और मंदवायु की हल्की छुअन
से कम्पित जल तरंग की तरह
अपने मासूम क्वारे सपने
परिजन तुम्हारे आश्वस्त ज़रूर हुए
तुम्हारे पाँव किसी 'ऊँच-खाल' में न पड़े
तुम पर गर्व हुआ होगा उनको
तुम्हें सुरक्षित रेल की पटरियों से खींच
वापस लाने वाले
नन्हें क्रिकेट खिलाड़ियों को आशीषा होगा
जीने के हौसले ऎसे
नहीं गँवाते बेटी, ना बेटी ना!
I am a person, with a happy go lucky attitude. I am extremely positive and passionate person. I believe in good human relationship. I am fond of reading books on various subject. I also write as a freelancer in Hindi.
Monday, February 6, 2012
Wednesday, February 1, 2012
दाग़-धब्बे छोड़ कर अच्छा ही अच्छा देखना
जानते हैं हम भी आईने में चेहरा देखना
सोच फिर छूने चली है उसके कदमों के निशां
उँगलियों को फिर ख़यालों की झुलसता देखना
वो कि प्यासा था मगर सोचा है कितने चैन से
हो-न-हो रास आ गया ख़्वाबों में दरिया देखना
हर तरफ़ फैला हुआ बेसम्त-बेमंजिल सफ़र
भीड़ में रहना मगर खुद को अकेला देखना
अपनी सोचों के ख़ला को जानना रंगों का बाग़
अपनी आँखों के अँधेरे को उजाला देखना
जगमगाती जागती दुनिया है खुद में इक अलग
आँख जब अबके लगे तुम भी तमाशा देखना
ये पुरानी रस्म है संसार की भाई ’तुफ़ैल’
हर सहारा जब जुरूरत हो तो छुटता देखना
जानते हैं हम भी आईने में चेहरा देखना
सोच फिर छूने चली है उसके कदमों के निशां
उँगलियों को फिर ख़यालों की झुलसता देखना
वो कि प्यासा था मगर सोचा है कितने चैन से
हो-न-हो रास आ गया ख़्वाबों में दरिया देखना
हर तरफ़ फैला हुआ बेसम्त-बेमंजिल सफ़र
भीड़ में रहना मगर खुद को अकेला देखना
अपनी सोचों के ख़ला को जानना रंगों का बाग़
अपनी आँखों के अँधेरे को उजाला देखना
जगमगाती जागती दुनिया है खुद में इक अलग
आँख जब अबके लगे तुम भी तमाशा देखना
ये पुरानी रस्म है संसार की भाई ’तुफ़ैल’
हर सहारा जब जुरूरत हो तो छुटता देखना
किसी को अपना करीबी शुमार क्या करते
वो झूठ बोलते थे, एतबार क्या करते
पलट के लौटने में पीठ पर लगा चाकू
वो गिर गया था तो फिर उस पे वार क्या करते
गुज़ारनी ही पड़ी साँसें पतझड़ों के बीच
जो तू नहीं था तो जाने-बहार क्या करते
दीये जलाना मुहब्बत के अपना मज़हब है
हम ऐसे लोग अँधेरे शुमार क्या करते
खयाल ही नहीं आया, है जख़्म-जख़्म बदन
जो चाहते थे तुझे खुद से प्यार क्या करते
मिज़ाज अपना है तूफ़ाँ को जीतना लड़कर
उतर गया था वो दरिया तो पार क्या करते
कुछ एक दिन में ग़ज़ल से लड़ा ही लीं आँखें
तमाम उम्र तेरा इंतजार क्या करते
वो झूठ बोलते थे, एतबार क्या करते
पलट के लौटने में पीठ पर लगा चाकू
वो गिर गया था तो फिर उस पे वार क्या करते
गुज़ारनी ही पड़ी साँसें पतझड़ों के बीच
जो तू नहीं था तो जाने-बहार क्या करते
दीये जलाना मुहब्बत के अपना मज़हब है
हम ऐसे लोग अँधेरे शुमार क्या करते
खयाल ही नहीं आया, है जख़्म-जख़्म बदन
जो चाहते थे तुझे खुद से प्यार क्या करते
मिज़ाज अपना है तूफ़ाँ को जीतना लड़कर
उतर गया था वो दरिया तो पार क्या करते
कुछ एक दिन में ग़ज़ल से लड़ा ही लीं आँखें
तमाम उम्र तेरा इंतजार क्या करते
सच सभी का कहा नहीं होता,
हादसा हर दफा नहीं होता ।
जख्मेदिल फिर हरा नहीं होता,
आजकल वो खफा नहीं होता ।
साँस लेने का मोल लेते हो,
इससे कोई नफा नहीं होता ।
ज़िंदगी से जो कट के रह जाए,
वो कोई फलसफा नहीं होता ।
दर्द की बात फेर ही कीजे,
दर्द दिल से जुदा नहीं होता ।
आदमी की बिसात क्या होगी,
आदमी तो खुदा नहीं होता ।
हादसा हर दफा नहीं होता ।
जख्मेदिल फिर हरा नहीं होता,
आजकल वो खफा नहीं होता ।
साँस लेने का मोल लेते हो,
इससे कोई नफा नहीं होता ।
ज़िंदगी से जो कट के रह जाए,
वो कोई फलसफा नहीं होता ।
दर्द की बात फेर ही कीजे,
दर्द दिल से जुदा नहीं होता ।
आदमी की बिसात क्या होगी,
आदमी तो खुदा नहीं होता ।
ज़िन्दगी की इक हक़ीकत आपसे कहता हूँ मैं
बिजलियों के दरमियाँ ही रात-दिन रहता हूँ मैं
तैरता है जिसका चेहरा मेरे दिल की झील में
उसकी ख़ुशबू से महककर ही ग़ज़ल कहता हूँ मैं
ख्व़ाब जब भी टूटते हैं ख़ुश्क पत्तों की तरह
रेत की दीवार-सा तब एकदम ढहता हूँ मैं
आँसुओं का है समन्दर मेरे दिल के बीच में
लोग ऐसा सोचते हैं ख़ुश बहुत रहता हूँ मैं
है वही सब कुछ मेरा जिसके लिए मैं कुछ नहीं
क्या बताऊँ किस तरह इस दर्द को सहता हूँ मैं
मन मेरा पागल हवा था एक वो भी दौर था
अब तो मन के साथ कमरे में पड़ा रहता हूँ मैं
बिजलियों के दरमियाँ ही रात-दिन रहता हूँ मैं
तैरता है जिसका चेहरा मेरे दिल की झील में
उसकी ख़ुशबू से महककर ही ग़ज़ल कहता हूँ मैं
ख्व़ाब जब भी टूटते हैं ख़ुश्क पत्तों की तरह
रेत की दीवार-सा तब एकदम ढहता हूँ मैं
आँसुओं का है समन्दर मेरे दिल के बीच में
लोग ऐसा सोचते हैं ख़ुश बहुत रहता हूँ मैं
है वही सब कुछ मेरा जिसके लिए मैं कुछ नहीं
क्या बताऊँ किस तरह इस दर्द को सहता हूँ मैं
मन मेरा पागल हवा था एक वो भी दौर था
अब तो मन के साथ कमरे में पड़ा रहता हूँ मैं
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