Tuesday, October 12, 2010

आपका टेस्ट और स्टाइल दर्शाती फ्लोरिंग टाइल्स
सुबोध भारतीय
First Published:12-10-10 12:13 PM
Last Updated:12-10-10 12:15 PM
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टाइल्स की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण इनका किफायती और सुविधाजनक होना है। फ्लोर टाइल्स का चलन इसलिए बढ़ता जा रहा है, क्योंकि पत्थर (स्टोन) के मुकाबले इन्हें बिछाना आसान होता है। पॉलिश करवाने का कोई झंझट नहीं और डिजाइन व रंगों की इतनी अधिक च्वाइस उपलब्ध है, जो कि स्टोन में नहीं है।

इस बारे में ला सरोजिका के इंटीरियर डिजाइनर सौरभ वार्ष्णेय बताते हैं, ‘टाइल्स के बिना हम किसी भी घर, होटल या रेस्टोंरेंट को सजाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। बाजार में उपलब्ध वैरायटी की रेंज इतनी अधिक है कि ग्राहक खुद निर्णय नहीं कर पाता कि किसे चुने और अंतत: सारा काम हमारी कल्पनाशीलता पर ही छोड़ दिया जाता है। टाइल्स के संबंध में अच्छी बात ये भी है कि फर्श का लुक बदलने के लिए बेकार की तोड़फोड़ की कोई जरूरत नहीं पड़ती। कैमिकल से थोड़े समय में टाइल्स बिछाना और लगाना एक अच्छा और आसान विकल्प है।’

टाइल्स का बाजार अब भारतीय टाइल्स निर्माताओं पर ही निर्भर नहीं रह गया है। चाइनीज टाइल्स धीरे-धीरे भारतीय बाजारों में अपनी पैठ बनाती जा रही हैं। सस्ती होने के कारण सीमित बजट वाले ग्राहक इन्हें पसंद करते हैं। हालांकि इस सच्चाई को भी झुठलाया जा नहीं सकता कि बहुत सी भारतीय कंपनियां चीन से टाइल्स आयात कर उस पर अपना ठप्पा लगा कर बेच रही हैं। स्टाइल और हर चीज में अपना डिफरेंट टेस्ट रखने वाले ग्राहकों को इटैलियन और स्पेनिश टाइल्स पसंद आती हैं। इनके रंग और डिजाइन अनूठे हैं, लेकिन यह चुनिंदा शो रूम्स पर ही उपलब्ध हैं। सेरेमिक और वैट्रीफाइड टाइल्स अब साटिन, लैदर और वुड फिनिश में उपलब्ध हैं। ग्लास और स्टील लुक टाइल्स भी इंटीरियर में ग्लैमर पैदा कर देती हैं।

न्यू ट्रेंड्स

टाइल्स में आजकल मैट फिनिश का चलन जोरों पर है। चमचमाती या ग्लॉसी टाइल्स अब ट्रेंड्स से आउट हो गई हैं। ग्लॉसी लुक अब चीप मानी जाती है। बाथरूम में फ्लोरिंग के लिए एंटी स्किड यानी फिसलन रोधी टाइल्स ही लगाना उचित है। इसकी सफाई भी आसान रहती है। बाथरूम में शावर के नीचे हाई लाइट के विरोधी कलर की टाइल्स लगाने से बाथरूम की खूबसूरती बढ़ जाती है। इनमें मोटिफ्स भी इस्तेमाल किए जाते हैं। किचन में कुकिंग एरिया के ऊपर 474 इंच की टाइल्स का रिवाज अब खत्म हो गया है। इसकी बजाय अब 2 फुट और 1 फुट की बड़ी टाइल्स लगने लगी हैं। इनमें भी नया ट्रेंड स्टील लुक वाली टाइल्स का है, जो रसोई की सफाई के लिए सहायक सिद्ध होती हैं। इनमें खाद्य पदार्थों या टी-सेट अदि के मोटिफ्स लगा कर खूबसूरती बढ़ाई जा सकती है। बैडरूम या लिविंग एरिया के फ्लोर पर बड़ी और कम से कम 272 की ज्वाइंट लैस टाइल्स लगाने का रिवाज आ गया है। इनमें ऐसी टाइल्स भी आ गई हैं, जो स्टोन लुक देती हैं।

आजकल फार्म हाउस या कोठी को कॉटेज लुक देने के लिए इनकी छत पर टैराकोटा से बनी कोरोगेटेड (नालीदार) टाइल्स बिछाई जाती हैं, जो देखने में बेहद खूबसूरत, सस्ती और आसानी से लगाई जा सकती हैं। लॉन या गार्डन एरिया में हैक्सामन या विविध आकार की स्टोन टाइल्स भी बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं, जो इस्तेमाल में रफ-टफ होती हैं और गार्डन एरिया की खूबसूरती बहुत बढ़ा देती हैं। बैडरूम जैसे एरिया में हमेशा फ्लोरिंग के लिए हल्के और पेस्टल शेड्स इस्तेमाल करें। इससे मानसिक सुकून महसूस होता है। किचन छोटा हो तो दीवारों पर हल्के रंगी की टाइल्स लगाना ही उचित रहेगा। बड़े किचन में सॉफ्ट रंग इस्तेमाल कर सकते हैं। बड़े या छोटे फ्लोर एरिया में गहरे या चटख रंगों की टाइल्स इस्तेमाल कर सकते हैं, इसका ज्यादा इस्तेमाल से फर्श जल्दी ही उबा देगा। कुछ चुनिंदा कम्पनियां अब कस्टम मेड यानी आपकी पसंद अनुसार टाइल्स भी बनाने लगी हैं, जिन्हें कम्प्यूटर की मदद से बनाया जाता है। इनमें आप अपने पसंदीदा मोटिफ्स या परिवार के फोटो भी प्रिंट करवा सकते हैं। ग्रे, हरा बेज (हल्का) और सेल्फ डिजाइन वाली टाइल्स भी आजकल चलन में है।

प्रमुख टाइल्स बाजार

राजा गार्डन
कोटला मुबारकपुर
मंगोल पुरी
जगत पुरी (कड़कड़डूमा)
ग्रेटर कैलाश
करोल बाग (रैगरपुरा)
मंगोल पुरी
ओखला
नोएडा
पीतमपुरा (शिवा मार्केट)

महत्त्वपूर्ण टिप्स

फ्लोरिंग में कभी भी छोटे टाइल्स इस्तेमाल न करें। इनके ज्वाइंट्स दिखने में भद्दे लगते हैं।

टाइल्स ज्यादा डिजाइन वाली न हों, अन्यथा आप जल्द ही उनसे ऊब जाएंगे।

शोख और चटख रंगों का कम से कम उपयोग करें। यह आंखों को चुभने लगते हैं।

हमेशा प्लेन सरफेस वाली टाइल्स चुनें, ताकि उन्हें आसानी से साफ किया जा सके। एंटीक लुक वाली टाइल्स में खड्डे होते हैं, जिनमें गंदगी और धूल जम जाती है।

टाइल्स बिछाने का काम किसी निपुण कारीगर से करवाएं। महंगी टाइल्स पर लगा पैसा बर्बाद हो सकता है।

बची हुई टाइल्स संभाल कर रखें। भविष्य में कोई भी टाइल खराब होने पर उसे बदलने में आसानी होगी। कई बार टाइल्स के डिजाइन भी बाजार से आउट हो जाते हैं।

घर के जिस हिस्से में ज्यादा आवागमन हो, वहां गहरे रंग इस्तेमाल न करें, वर्ना वह थोड़े दिनों में बदरंग नजर आने लगेगा।

छोटी स्पेस में भी बड़ी और ज्वाइंट लेस टाइल्स लगाने से वह एरिया खुला और बड़ा दिखाई देता है।

हैवी ट्रैफिक एरिया में मजबूत और रफ-टफ टाइल्स लगाएं, क्योंकि उस पर जूते पहने लोग चलेंगे। इसके विपरीत बाथरूम में सॉफ्ट फील वाली टाइल्स नंगे पैरों को अच्छा एहसास देंगी।

टाइल्स की किस्में टाइल्स के आकार टाइल्स का उपयोग
सेरेमिक 8x8 इंच बाथरूम
स्लेट 12x12 इंच लॉबी फ्लोर
ग्लास 8x12 इंच ड्राइंग रूम
मोजेक 12x18 इंच फ्लोर
फाइबर 24x24 इंच मेन डोर वॉल
ग्रेनाइट 48x48 इंच कोटेज रूफ
वेट्रीफाइड 13x27 इंच गज़िबो रूफ

(यह लेख १२ अक्टूबर के दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुआ है.)

Friday, October 8, 2010

संगीत में रंग जमाती सुरीली जोड़ियां
सुबोध भारतीय
First Published:07-10-10 01:51 PM
Last Updated:07-10-10 01:52 PM
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हिंदी फिल्मों से संगीत का अटूट नाता है। सवाक फिल्मों के 60-70 वर्षीय इतिहास में शायद 20 फिल्में भी ऐसी नहीं बनी होंगी, जिनमें गीत-संगीत न हो। इसी प्रकार हिंदी फिल्मों के हर दौर में संगीतकारों की जोड़ियां अपना परचम फहराती रही हैं।
सबसे पहली संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम की थी, जिन्हें लता मंगेशकर को ब्रेक देने का श्रेय प्राप्त है। इन्होंने अपने समय में काफी लोकप्रियता हासिल की। उन दिनों यह जोड़ी अकेले ही चला करती थी और इनके मुकाबले में नौशाद, सी. रामचन्द्र, अनिल विश्वास, चित्रगुप्त, सरदार मलिक जैसे धुरंधर संगीतकार थे।

फिल्माकाश में राज कपूर के आर.के. बैनर के उदय के साथ ही संगीतकार जोड़ियां चल निकलीं। बरसात, आवारा, आग में शंकर जयकिशन के संगीत ने मानो संगीत प्रेमी दिलों पर जादू कर दिया। एक के बाद एक हिट संगीत ने उनकी लोकप्रियता को आसमान तक पहुंचा दिया। खय्याम, एस.डी. बर्मन, रौशन, मदन मोहन, ओ.पी. नैयर जैसे दिग्गजों के होते हुए भी इनकी तूती बोलती रही। अपने समय में शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने अपने शानदार संगीत से तीन सालों तक लगातार (1971-1973) फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते तथा कुल नौ बार। सत्तर के दशक के अंत में जयकिशन की मौत के बाद शंकर ने दस नंबरी और संन्यासी जैसी सुपरहिट फिल्में देकर मानो अपनी पारी समाप्ति की घोषणा कर दी। राजकपूर जैसे मित्र ने भी अब तक उनसे नाता तोड़ लिया था और उनके बैनर तले बनने वाली धर्म करम में आर.डी. बर्मन और बॉबी में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत था।

फिल्मी दुनिया की आगामी हिट संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी की थी, जो साठ के दशक में हेमंत कुमार के असिस्टेंट हुआ करते थे। इनकी जोड़ी ने भी एक के बाद एक छलिया, सरस्वतीचंद्र, उपकार, जंजीर, हेराफेरी, सुहाग, लावारिस, मुकद्दर का सिकंदर, डॉन, अपराध, कुरबानी जैसी हिट फिल्में देकर धूम मचा दी। मगर कल्याणजी के निधन के बाद यह जोड़ी फिल्मों से आउट हो गई। कल्याणजी के पुत्र वीजू शाह ने त्रिदेव, मोहरा आदि फिल्मों के जरिए अपने पिता का जादू चलाने की कोशिश की, मगर अंतत: गुमनामी के अंधेरे में खो गए।

1962 में आई राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म दोस्ती ने कल्याणजी-आनंदजी के सहायक लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को ब्रेक दिया। पारसमणि, आया सावन झूम के, शोर, दाग, रोटी कपड़ा और मकान, नसीब, अमर अकबर एंथनी, रोटी, प्रेम रोग, इक दूजे के लिए, कजर्, सौदागर, राम-लखन, खलनायक, तेजाब, कर्मा, हीरो, सरगम, सत्यम् शिवम् सुंदरम्, क्रांति और हम जैसी सुपरहिट फिल्मों से इस जोड़ी ने जल्द ही अपने गुरुओं को टक्कर देनी शुरू कर दी। मनोज कुमार, राजकपूर, जे. ओमप्रकाश और सुभाष घई जैसे दिग्गजों का प्रश्रय पाकर इन्होंने फिल्मी संगीत को अनेक हिट गीत दिये। अपने शानदार संगीत से चार सालों तक लगातार (1978-1981) फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते। 1999 में लक्ष्मीकांत के निधन के बाद संगीतकारों की यह सबसे कामयाब जोड़ी भी लुप्त हो गई।

इसके बाद के आधुनिक फिल्म संगीत में आनंद-मिलिंद, नदीम-श्रवण और जतिन-ललित का उदय हुआ। जहां आनंद-मिलिंद कयामत से कयामत तक, अंजाम, दिल, बेटा, दूल्हे राजा, कुली नं. 1, अनाड़ी के बाद सफलता कभी दोहरा ना सके, वहीं नदीम-श्रवण आशिकी के साथ फिल्म संगीत के आकाश पर धूमकेतू की तरह छा गए। साजन, दिल है कि मानता नहीं, फूल और कांटे, दीवाना, जुनून, सर, हम हैं राही प्यार के, राजा हिंदुस्तानी जैसी एक के बाद एक हिट फिल्म देकर और लगातार तीन फिल्म फेयर पुरस्कार जीत कर इन्होंने मानो शंकर-जयकिशन की याद ताजा करा दी। गुलशन कुमार की हत्या के आरोपी नदीम के भारत छोड़ कर लंदन भाग कर शरण लेते ही यह जोड़ी अपना जादू खो बैठी। हालांकि उस समय यह जोड़ी टॉप पर थी। एक बार फिर कई वर्ष बाद धड़कन में अपना हिट संगीत देने में कामयाब रहे, मगर वो ट्यूनिंग फिर से न बन पाई और यह जोड़ी बिखर गई। श्रवण के पुत्रों संजीव-दर्शन ने मन में सुमधुर संगीत दिया था, मगर फिल्म फ्लॉप होने से इनके करियर को ब्रेक लग गया।

सुलक्षणा पंडित के भाई जतिन-ललित इतने प्रतिभावान थे कि उनका संगीत कभी आर.डी. बर्मन तो कभी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत की याद दिलाता था। मधुर संगीत से रची इनकी धुनों ने इन्हें ऊंचा दर्जा दिलाया था-जो जीता वही सिकंदर, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, कभी हां कभी ना, राजू बन गया जेंटलमैन, चलते-चलते, हम तुम, मौहब्बतें, कभी खुशी कभी गम, फना, कुछ कुछ होता है जैसी म्यूजिकल फिल्मों के रचयिता लंबी रेस के घोड़े थे, मगर अहं के टकराव के चलते पिछले वर्ष यह जोड़ी टूट गई। अब यह अलग-अलग काम कर रहे हैं, मगर एक भी हिट फिल्म नहीं दे पाए हैं।

शिव कुमार शर्मा और हरि प्रसाद चौरसिया जैसे दिग्गज शास्त्रीय वादकों की जोड़ी को यश चोपड़ा ने सिलसिला में शिव-हरि के रूप में प्रस्तुत किया। इसके बाद चांदनी, डर, लम्हे, परंपरा, विजय आदि में भी। यश चोपड़ा कैम्प से आउट होने के बाद इस जोड़ी को किसी ने नहीं पूछा। अब यह फिल्मों से दूर है।

फिल्म संगीत के आकाश में अभी एक अच्छी टीम शंकर-एहसान-लॉय की है, जो लगातार सुमधुर संगीत देते जा रहे हैं। कल हो ना हो, रॉक ऑन, डॉन, दोस्ताना, मिशन कश्मीर, दिल चाहता है, बंटी और बबली, तारे जमीन पर आदि फिल्में इनके दमदार संगीत का शानदार प्रमाण हैं। इसी प्रकार सलीम-सुलेमान ने आचा नच ले, रब ने बना दी जोड़ी, चक दे इंडिया और विशाल-शेखर की जोड़ी ने दस, झंकार बीट्स, ओम शांति ओम के हिट संगीत दिए।

इन्होंने काफी संभावनाएं जगाई हैं। नये संघर्षरत संगीतकारों में साजिद-वाजिद को सलमान ने काफी प्रमोट किया। प्यार किया तो डरना क्या, हैलो ब्रदर, वांटेड, पार्टनर, मैं और मिसेज खन्ना जैसी फिल्मों से यह उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं।

संगीतकार जोड़ियां
हुस्नलाल-भगतराम
शंकर-जयकिशन
कल्याणजी-आनंदजी
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल शिव-हरी
सपन-जगमोहन

सोनिक-ओमी
आनंद-मिलिंद
दिलिप सेन-समीर सेन
अमर-उत्पल
उत्तम-जगदीश
नदीम-श्रवण
जतिन-ललित
शंकर-एहसान-लॉय
विशाल-शेखर
साजिद-वाजिद
सलीम-सुलेमान
संजीव-दर्शन
निखिल-विनय
बापी-ततुल
जीतू-तपन

(यह लेखअक्टूबर को दैनिक हिंदुस्तान मैं प्रकाशित हुआ है)

Tuesday, September 14, 2010

राखी पर मिठाइयां खरीदते समय..


सुबोध भारतीय
First Published:19-08-10 12:05 PM

राखी का त्योहार करीब है और इस अवसर पर बहनें अवश्य ही अपने भाइयों का मुंह मीठा करवाएंगी। मगर पिछले कुछ समय से मीडिया में मिठाई के प्रति आ रही नकारात्मक खबरों ने आम जनता के मन में संदेह उत्पन्न कर दिया है। फिर भी मिठाई के बिना कोई उत्सव मनाना असंभव है। आइये जानें राखी के अवसर पर आप किस तरह अच्छी मिठाइयों का चयन कर सकते हैं।

मिठाइयां मुख्यत: तीन प्रकार की होती हैं- पहली ड्राई-फ्रूट्स से बनी मिठाइयां। दूसरी दूध या मावे से बनी मिठाइयां और तीसरी परंपरागत मिठाइयां, जिनमें देसी घी मुख्य तत्व रहता है।

ड्राई-फ्रूट्स जैसे काजू, बादाम और पिस्ता से बनी मिठाइयों की गुणवता के बारे में अधिक संदेह की गुंजाइश नहीं है। इनकी पूरी वैरायटी जैसे काजू कतली, पिस्ता लॉज, काजू रोल, मेवा बाइट्स, बादाम बरफी, अंजीर बर्फी इत्यादि आपको सिर्फ बड़े और नामी-गिरामी हलवाइयों के यहां ही मिलेगी। इनकी शेल्फ लाइफ अन्य मिठाइयों से ज्यादा होती है, मगर दाम करीब दोगुने। यदि आपकी पॉकेट इजाजत दे तो यह एक अच्छा चयन हो सकता है।

मिठाइयों में दूसरा वर्ग-दूध, छैने या मावे से बनी मिठाइयों का है। इन्हीं में सबसे अधिक मिलावट की आशंका होती है, विशेषकर मावे से बनी मिठाइयों में। इनमें सिन्थेटिक दूध और नकली मावा (देसी घी रहित) इस्तेमाल किया जा सकता है। मावे से बनी मिठाइयों में जल्दी खराब होने की संभावना भी होती है। इनमें से छैने से बनी मिठाइयों-जैसे मलाई चाप, रसगुल्ला, पाकीजा, रस माधुरी, राजभोग, रस कदम, संदेस इत्यादि की शेल्फ लाइफ तो मात्र कुछ घंटों की ही होती है। हालांकि यह मिठाइयां खाने में अत्यंत सुस्वादु तथा देखने में सुन्दर होती हैं, मगर इन मिठाइयों को लेने-देने में इस्तेमाल से परहेज करना चाहिए। दूध और मावे से बनी कुछ मिठाइयां जैसे गुलाब जामुन, मिल्क केक, पेड़ा आदि सबसे ज्यादा दिनों तक चलती हैं, क्योंकि इन्हें देर तक पका कर बनाया जाता है।

तीसरे वर्ग यानी घी से बनी मिठाइयों में सबसे कम मिलावट के चांस हैं और यह आपकी जेब पर भी भारी नहीं पड़ेंगी। आपको यह मिठाइयां उन दुकानों से खरीदनी होंगी, जो सारी मिठाइयां देसी घी में ही बनाते हैं। इन मिठाइयों को आप हफ्ते-दस दिन तक भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इन मिठाइयों में प्रमुख हैं-मोतीचूर के लड्डू, बेसन के लड्ड, पंजीरी लड्ड, बालू शाही, इमरती, सोहन पापड़ी, पतीसा, मूंग दाल बरफी, पिन्नी, नारियल बर्फी इत्यादि। इन मिठाइयों के पक्ष में एक बात और जाती है कि कुछ दिनों बाद भी इनके स्वाद में ज्यादा अंतर नहीं पड़ता।

अंत में इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि मिठाइयां अपने इलाके के पुराने और प्रतिष्ठित हलवाइयों से ही खरीदें। यह अपनी प्रतिष्ठा की कीमत मिलावट से ऊपर ही रखते हैं। राखी, दीवाली के अवसर पर खुलने वाली नुक्कड़ दुकानों से कदापि सामान न खरीदें, क्योंकि उनका सामान नकली व बासी हो सकता है। ये दुकानें चन्द दिनों के लिए ही अस्थाई रूप से चलाई जाती हैं। सबसे जरूरी बात मिठाई खरीदते समय यह कि पहले मिठाई विशेष को चख लें, यदि अच्छी लगे और आप संतुष्ट हों तभी खरीदें। छोटी दुकानें मिठाई का डिब्बा साथ में तोल कर ग्राहकों को चूना लगाती हैं, जबकि बड़ी दुकानों में डिब्बे का वजन अलग किया जाता है। इसका ध्यान रखें।

इस बारे में अग्रवाल स्वीट कॉर्नर, द्वारका के एमडी विनोद अग्रवाल का कहना था-मिलावटी मावे या मिठाइयों की घटनाएं आज तक दिल्ली के किसी भी नामी या पुराने हलवाई के साथ नहीं हुई हैं। हमारी मिठाइयां कुछ महंगी अवश्य हो सकती हैं, मगर हमें अपनी प्रतिष्ठा, जो हमने सालों-साल मेहनत करके बनाई है-ज्यादा प्यारी है। इसलिए हम कभी भी हल्का सामान इस्तेमाल नहीं करते।

ज्यादा शेल्फ लाइफ वाली मिठाइयां

1. काजू कतली, 2. पिन्नी, 3. ढोढा, 4. मोतीचूर-लड्ड, 5. पेठा, 6. बेसन लड्ड, 7. पंजीरी लड्ड, 8. पेड़ा, 9. सोहन पापड़ी, 10. पतीसा, 11. बालू शाही, 12. मिल्क केक।

न्यू वैडिंग ट्रेंड्स

शादियों का मौसम बस कुछ दिनों बाद दस्तक देने ही वाला है, जो कि थोड़े-थोड़े अन्तराल के साथ फरवरी-मार्च तक चलेगा। दिल्ली में शादियों के दो ही सीजन होते हैं - गर्मियों में और सर्दियों में। जो लोग शादी की भव्यता का पूरा आनन्द लेना चाहते हैं, वह शादियां सर्दी में ही करते हैं, क्योंकि यह सीजन लम्बा होता है और पसीने- गर्मी से बदहाल भी नहीं करता। आइये देखें आजकल दिल्ली में शादियों के दौरान क्या कुछ नया होने लगा है। सुबोध भारतीय की रिपोर्ट

वैडिंग फैशन

पिछले एक-दो वर्षों में दूल्हा-दुल्हन के परिधानों का फैशन बदला है। प्रसिद्ध फैशन डिजाइनर रुचिका मोदी के अनुसार, अब लोग ज्यादा डिमांडिंग हो गए हैं और तैयार ड्रेसेज को देख कर उनमें अपनी रुचि के अनुसार परिवर्तन करवाते हैं। अब पुराने लहंगे का रिवाज खत्म हो गया है, जिसमें बड़ा सा घेरदार लहंगा होता था। अब ये कमर व घुटनों तक बॉडी के हिसाब से फिटेड होते हैं और उसके बाद कलियों से घेरा बनाया जाता है। इससे दुल्हन की फिगर छुपती नहीं, बल्कि आकर्षक लगती है। इन लहंगों में आजकल ब्राइट कलर चल रहे हैं, जैसे ऑरेंज, गुलाबी, पीला व परंपरागत मैरून। इनमें शिमर, नेट, जॉर्जेट और शिफॉन कपड़े इस्तेमाल किये जाते हैं। इन लहंगों में जरदोरी नक्शी या कोटा पत्ती का काम किया जाता है। कीमत 25,000 से शुरू होती है और ऊपरी लिमिट कोई नहीं।

आजकल शादियों में संगीत और मेहंदी आदि के अलग फंक्शन भी धूमधाम से मनाये जाते हैं। इनके लिए दुल्हनें वेस्टर्न गाउन्स पहनने लगी हैं या लहंगा साड़ी। इस लहंगा साड़ी में पल्लू पहले से फिक्स होता है और साड़ी की तरह चुन्नटें नहीं बांधनी पड़तीं। छाबड़ा 555 के लालचंद मूलचन्दानी के अनुसार, लहंगा साड़ी का चलन अब बढ़ता जा रहा है, क्योंकि शादी का एक फंक्शन नहीं होता। दुल्हन को मेहंदी, संगीत या चुन्नी की रस्म में भी अलग दिखना होता है।

दूल्हों के परिधान में भी पिछले कुछ सालों में परिवर्तन आया है। वेस्टर्न सूट का रिवाज प्राय: खत्म ही हो गया है। शेरवानी तो दूल्हों की पहली पसंद है ही, इंडो-वेस्टर्न सूट का रिवाज भी अब तेजी से बढ़ता जा रहा है। दीवान साहब, गुजराल संस, रॉड आदि शोरूम्स पर इंडो-वेस्टर्न सूट्स उपलब्ध हैं। इनकी प्राइज रेंज 15,000 से शुरू होकर 50,000 तक है।

मेकअप

दुल्हनों के मेकअप या लुक में अब काफी बदलाव आया है। सौन्दर्य विशेषज्ञ भारती तनेजा के अनुसार, दुल्हन के चेहरे पर अब बिंदियों का श्रृंगार कम से कम होता जा रहा है। साठ के दशक वाले आई लाइनर्स ट्रैंड में हैं। आंखों पर ग्लिटर्स की शिमरिंग की जाती है, जबकि फॉल्स आई लैशेज अब पहले से बेहतर और परिपूर्ण हो गई हैं। पहले जो मेकअप ब्रश और हाथों से किया जाता था और चेहरे पर काफी मोटी लेयर्स रहती थीं, अब उसकी जगह एयर ब्रश से वॉटर प्रूफ मेकअप किया जाता है। एयर ब्रश तकनीक में मौसम और दुल्हन की त्वचा के अनुसार मेकअप एडजस्ट हो जाता है। यह काफी नेचुरल लगता है और अधिक सफाई से होता है। दुल्हनों के ब्राइडल मेकअप की रेंज 8,000 से 21,000 तक है।

दूल्हे भी मेकअप के मैदान में पीछे नहीं हैं। जेन्ट्स या यूनीसेक्स सैलून्स में ग्रूम्स पैकेजचल रहे हैं। इनमें पैडिक्योर, मेनिक्योर से लेकर फेशियल, ब्लीचिंग, फेस मसाज और हेयर स्टाइलिंग भी की जाती है।

फोटोग्राफी

विवाह उत्सव की भव्यता में एक अहम रोल फोटोग्राफी का भी होता है। शादी के सारे समारोह निबट जाने के बाद उसके यादगार पल एलबम में सिमट जाते हैं, जो सालोंसाल शादी की भव्यता की याद दिलाती रहते हैं। दिल्ली के नामचीन प्रेम स्टूडियो के मुकेश राजपूत के अनुसार, 12 बाई 30 की करिज्मा एलबम आजकल प्रचलन में है। शादियों में स्टूडियो लगाने से भी दूल्हा-दुल्हन व परिवार के प्रोफेशनल फोटोग्राफ मिल जाते हैं। कई बार मेजबान अपने मेहमानों के परिवार के भी फोटोग्राफ इन्हीं में खिंचवाते हैं, बाद में उन्हें यादगार के रूप में भेज देते हैं। आजकल के वैवाहिक आयोजनों को देखते हुए फोटोग्राफी का बजट एक-डेढ़ लाख तक जाता है। अभी लेटेस्ट ट्रैंड मैटेलिक पेपर पर 16 बाई 24 की एलबम बनाने का है, जिसमें प्रति एलबम 30 हजार रु. तक खर्चा आता है।

वीडियोग्राफी का लेटेस्ट ट्रैंड हाई डेफिनेशन वीडियोग्राफी का है। शादी के आयोजन में जिप क्रेन द्वारा मूविंग कैमरा लगाया जाता है और बड़ी-बड़ी स्क्रीन्स पर इसे लाइव दिखाया जाता है। वीडियोग्राफी में प्रति कैमरा 10 से 18 हजार रुपये तक का खर्च आता है। फाइनल डीवीडी बनाने में मिक्सिंग, एडिटिंग के लेटेस्ट सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किए जाते हैं।

पंडाल और कैटरिंग

पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली में पार्किंग और स्थान की तंगी के बावजूद पंडालों में शादियों का चलन बढ़ा है। फाइव स्टार होटल्स और बैंकेट हॉल्स की बजाय बड़ी-बड़ी जगहों में भव्य पैमाने पर टैंट वालों द्वारा ग्राहकों की मांग के अनुसार इंडिया गेट, अक्षर धाम, राजस्थानी मुगल आदि थीम बनाई जा रही हैं। मोहन टैंट हाउस के अविनाश ओबेराय के अनुसार- हमारे ग्राहक अब थीम बेस डेकोरेशन पर ज्यादा जोर देने लगे हैं। इनमें रॉयल या डेस्टिनेशन वेडिंग थीम काफी लोकप्रिय हैं। लोग इसी प्रकार का एक्सटीरियर और इंटीरियर चाहते हैं और सजावट में छोटी से छोटी चीज का ध्यान रखने लगे हैं। पार्किंग की समस्या का समाधान वैले पार्किंग के रूप में आया है, जो कि थीम बेस वेडिंग में जरूर ही उपलब्ध रहती है। इससे मेहमानों को काफी अच्छा महसूस होता है। थीम बेस पंडाल का खर्च 10 लाख से ऊपर ही आता है।

कैटरिंग का व्यवसाय अब काफी बड़ा रूप ले चुका है। मेजबान अपने मेहमानों को अधिक से अधिक और बेहतरीन वैरायटी खिलाना चाहते हैं। यही वजह है कि आज एक शादी की पार्टी में 80 से 250 तरह के व्यंजन परोसे जा रहे हैं। दिल्ली के प्रसिद्ध कैटरर सेवन सीज के कल्याण दास का कहना है- अब खाने की वैरायटी में कोई सीमा नहीं रही। फ्रूट चाट में विदेशी फलों के अलावा थाई, मैक्सिकन और इटेलियन पित्जा जैसी वैरायटी अब आम हो गई है और कॉकटेल के बिना कोई पार्टी पूरी नहीं होती। मेहमानों को अब दावत में केक पेस्ट्री की वैरायटी के साथ-साथ मुगलई, साउथ इंडियन, पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती, मैक्सिकन, चाइनीज और थाई फूड की वैरायटी भी एक ही पंडाल में मिल जाती है। मिठाइयों और आइसक्रीम तथा कुल्फी की वैरायटी भी अब कम से कम 15 किस्म की होती है। चाट काउंटर्स और स्नैक्स की वैरायटी भी अब अनगिनत हो गई हैं। इस प्रकार के आयोजन में प्रति प्लेट 800 से लेकर 1500 रुपये तक खर्चा आता है।

निमंत्रण

शादी की तैयारी में सबसे महत्त्वपूर्ण रोल निमंत्रण पत्र यानी वैडिंग कार्ड का होता है। अब औसत दर्जे का शादी कार्ड 25-75 रुपये का बनता है और बड़े दर्जे की शादी करने वाले लोग शादी कार्ड 500 रुपये तक का बनवाते हैं। इम्पोर्टेड पेपर पर गोल्डन लीफ प्रिंटिग, यूवी इफैक्ट व लेजर कट के मोटिफ लगाने से लेकर शादी कार्ड से मैचिंग मिठाई और भाजी का डिब्बा तक बनाया जाता है। यही लेटेस्ट ट्रैंड है। प्राय: सभी निमंत्रण पत्रों के साथ मैचिंग मिठाई का डिब्बा बांटा जाता है। इसके लिए लोग चावड़ी बाजार से लेकर लुधियाना के फव्वारा चौक तक पहुंच जाते हैं। आखिर शादी की भव्यता का अंदाजा शादी कार्ड के गेटअप से ही हो जाता है। वैसे जिन निमंत्रण पत्रों के साथ मिठाई बांटी जाती है, उन्हें व्यक्तिगत रूप से देने का चलन है, जबकि यदि सिर्फ कार्ड ही भेजना हो तो कूरियर से भेज कर फोन कर दिया जाता है.

(यह लेख १४ सितम्बर को हिंदुस्तान हिंदी दैनिक में प्रकाशित हुआ है)

Monday, May 31, 2010

मौत के चुनिन्दा शेर

मौत का एक दिन मुकरर है
नींद क्यों रात भर नहीं आती

पल भर की खबर नहीं
सामान उम्र भर का


अब तो घबरा के कहते हैं कि मर जायेंगे
मर के भी चैन न पाया तो किधर जायेंगे

Thursday, September 3, 2009

नया लतीफा

मुल्ला को उसके एक दोस्त ने बताया की तुम्हारी बीबी हर रोज़ रात को तुम्हारे ही पिछवाडे तुम्हारे दोस्त से आधी रात को छुप छुप के मिलती है तो मुल्ला को गुस्सा आ गया। रात को एक बन्दूक ले कर मुल्ला अपने घर के पिछवाडे इंतज़ार में बैठ गया की आज ये नज़ारा हो और मैं दोनों को गोली से उढा दू । इंतज़ार करते करते सुबह होने को आयी तो मुल्ला को याद आया की उसकी तो अभी शादी ही नहीं हुई.

Thursday, June 4, 2009

एक शेर मुलाहिजा फरमाएं


कौन कहता है बुढापे में मुहब्बत का सिलसिला नहीं होता
आम भी रसीला नहीं होता जब तक पिलपिला नहीं होता